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Monday, May 9, 2011

Mobile गणेश

आज जब laptop bag में Pen खोजने के लिए हाथ डाला, तो हाथ आये bag -वाले गणेश.

Bag वाले भगवान अलग श्रेणी, अलग category के होते हैं. वही फर्क जो landline और mobile में होता है, bag वाले और घर वाले भगवान में भी होता है. Bag वाले भगवान light -weight और compact किस्म के होते हैं. इनमें भी अलग अलग varieties आती हैं - जैसे कि calendar वाले हनुमान, photo वाले साईं बाबा, locket रुपी माता रानी, वगैरह वगैरह. और यदि आप मूर्ती पूजन के विरुद्ध हैं, तो ख़ास आपके लिए आता है chewing gum के size का विभूति का packet , या फिर 108 बार राम नाम लिखा चावल का तिनका. गिनने का कष्ट न कीजिएगा. यदि श्रद्धा न हो तो उबाल के खा लीजिये.

हाँ, तो bag वाले गणेश जी मुझे मेरी दीदी ने दिए थे. दीदी ने मुझे कई bag वाले भगवान दिए हैं. भई अब जितने bag होंगे, उतने भगवान भी तो होने चाहिए. तो मतलब समझ लीजिये, कि जब भी किसी shopper's stop में सेल लगती है, हमारी पारिवारिक परंपरा कि वजह से, भगवानों के business में भी बढौतरी होती है. Economics की भाषा में इन्हें "complimentary business" कहते हैं. और कुछ लोग कहते हैं कि economics और religion सगे नहीं!

लाल रंग के छोटे से गणेश जी जब अचानक bag से निकले, तो बिलकुल वैसा लगा जैसे पुरानी किसी jeans में से 50 का नोट निकल आया हो. मन में ख़ुशी कि लहर दौड़ उठी. "क्यों गणेश जी? कहाँ छुप के बैठे रहे इतने दिन? हाथ आ ही गए ना !", थोड़ी देर हाथ में पकड़े-पकड़े मैंने उन्हें निहारा. क्या सोचते होंगे दिन भर बैग में बैठे-बैठे? "ये आया pen drive ! ये आया 2 का सिक्का! अरे! Design बदल दिया? पुराना वाला बेहतर था. कम से कम फर्क तो समझ आता था 2 और 1 के सिक्के में. खैर! अरे, ये क्या? नया mobile ? शुक्र है! Reliance CDMA को तो अब मैं भी नहीं बचा सकता. ये 3G है. अब wi-fi से दर्शन दिया करूंगा सबको. ऊँह हूँ ! फिर इस लड़की ने hotel वाला tissue घुसेड़ दिया! कब छोड़ेगी ये चिंदी-चोरी. वैसे तो बड़ी बातें करती है, दुनिया बदलने की. अपना bag साफ़ कर ले यही बहुत बड़ी बात होगी. दम घुट गया इस कबाड़-खाने में. मैं भी घर-वाला भगवान होता. मुझे भी इसकी माँ रोज़ प्यार से नहलाती. गुरुवार-गुरुवार साईं बाबा की खीर में से मैं भी कुछ प्रसाद चख लेता. लेकिन नहीं! इसे मेरी याद दिलाने के लिए तो कोई hard disk ही crash करानी होगी. या फिर जब लड़ लेगी किसी से, बैल की तरह, तब आएगी विघ्नहर्ता के पास रोते रोते. खैर! Wallet वाले साईं बाबा के पास हो के आता हूँ."

Wallet वाले साईं बाबा की condition थोड़ी बेहतर है. लेकिन आजकल उन्हें भी फिक्र होने लगी है, "क्या बताऊँ गणपति! पहले पाँच सौ - पाँच सौ के नोट हुआ करते थे, अब दस- पचास- सौ ही रहते हैं. सोचती है मुझे wallet में कैद रखने से पैसों की कमी नहीं होगी. अगर ऐसा होता तो सरकार नोट छापने के बजाय, मेरी तस्वीर न छापती?"

"हाँ, बात तो सौ आने की करी आपने"

"हा हा हा, तुम अभी भी भी आनों में ही अटके हो, गणपति ?"

" बुरा न मानना बाबा, अटके तो आप हैं. पाँच साल हो गए आपको इसके boyfriend की तस्वीर अपनी तस्वीर के पीछे छुपाये हुए. कभी मम्मी के सामने खुल जाता, तो इधर उधर तो आपको ही adjust करना पड़ता ना? अब शादी हो गयी है दोनों की, तो भूल ही गयी की अपने मियाँ की photo छुपाने की अब ज़रुरत नहीं. हमारी और उस बेचारे की एक ही दशा है - भूले- बिसरे, बंद, अँधेरी कोठरी में.."

"शुश्श.. गणपति, लगता है हाथ अन्दर आया!"

"भगवान! आज तो बाहर निकाल ले !"

और बाहर निकले गणेश जी!

गणेश जी, I am sorry . आप बहुत cute लग रहे हैं. जी भर के आपको निहार भी लिया. लेकिन अब आपको वापस जाना पड़ेगा, काल-कोठरी में, उन्हीं pens , headphones , tissue , post -its और wallet वाले बाबाजी के पास. माना कि आपके बारे में भूल जाती हूँ, और दुःख में ही सुमिरन करती हूँ, लेकिन mobile गणेश जी! अच्छे network कि यही तो ख़ासियत होती है. ऐसा साथ निभाता है कि अपनी कमी महसूस ही नहीं होने देता. आदत भी इतनी पड़ जाती है, कि उसी कि वजह से काम होते हैं, और उसी को भूल जाते हैं. तो फिर नाराज़ न होइए! "Wherever you go, our network follows" का मंत्र अपनाइए! जो किया, सो किया. अब Nokia कि तरह अपना बढ़िया वाला connection लगाइए.. और ये गए bag के अन्दर!

और सुनिए! मैं इतनी बुरी लड़की भी नहीं हूँ. ख़ास आप ही की सवारी के लिए HP का मूषक, यानि की mouse बैग में छोड़ा है.

क्या कहा? "Made in China" है? क्या गणेश जी! थोड़ा adjust कर लीजिये ना!


Saturday, February 26, 2011

भ्रम

हृदय में मचा भूचाल
बढ़ते हाथ कलम की ओर
मानो कलम न हो, हो ढाल

भ्रम में रहती जीवित
न रहते उसके होगा
मन आघातों से पीड़ित

कि करती कैद कहानी
और हरते हर मंशा को
शब्द-रुपी सैनानी

जैसे कागज़ की ओर
नस-सी कलम में बहता
रक्त हृदय को छोड़


करता शब्दों को संचित
जागृत होती कविता
मंद-मंद मन मूर्छित..

Saturday, December 5, 2009

यंग इण्डिया

कॉफ़ी शॉप पे बैठा  
युवा  ग्रुप 
चर्चा का विषय 
सोनल का देहाती एक्सेंट 
ठहाकों के बीच
सहसा एक आवाज़ 
जैसे आता देख 
दूध में उबाल
कोई चिल्लाई हो
" पिज़्ज़ा खाना है! "

एक लड़के ने मोबाइल उठाया 
होम डेलिवेरी का नंबर मिलाया
महत्त्वाकांक्षाओं से 'बर्स्ट'  होते
यंग इण्डिया ने
' चीज़ बर्स्ट ' पिज़्ज़ा मंगवाया

Thursday, December 3, 2009

अर्थशास्त्र

एक सौ बीस रुपये में बिकता
समस्त जीवन का अर्थ
ग्यारह लाइनों में सिमटा 
ग्यारह हज़ार वेदनाओं का दर्शन
सेकंड-हैण्ड किताबों के बीच, अनछुआ,
एक कवि का इतिहास 

Thursday, February 5, 2009

संस्कृति

उन लोगों को समर्पित, जो भारत की संस्कृति के नाम पर हिंसा, दमन, शोषण और अंधविश्वास फैलाते हैं...

है
ख़ासा इस पर शोर हुआ
कोई कोतवाल, कोई चोर हुआ
सदियों तक इस पर बहस हुई
नहीं जिसका कोई भोर हुआ

हैं रखवारे इसके अनेक
कर्ता, ज्ञाता, रचयिता भी
पर मायावी किसी यक्षिणी सी
यह बदल रूप सबको छलती


जितनी आँखें देखें इसको
उतनी ही दिखें इसकी छवियाँ
सदियों तक इस पर बहस हुई
नहीं जिसका कोई भोर हुआ

वो बतलाना जिसे चाहते हैं
भारत कि अविचल संस्कृति
गंगा जो भर दो गागर में
गागर सी ले ले आकृति

जल की एक बूँद जमाने से
गंगा का क्या तय रूप हुआ?
सदियों तक इस पर बहस हुई
नहीं जिसका कोई भोर हुआ


कोई पंडित है उपनिषदों का
कोई इतिहास, कोई लाठी का
सब एक नाम में ढूँढते हैं
अस्तित्व अपने होने का

चींटी तो ढेले को नापे
पर्वत का उसको मान कहाँ?
सदियों तक इस पर बहस हुई
नहीं जिसका कोई भोर हुआ

जो पहनावे में खोजें इसे
पूछें उनसे, क्या है सही?
क्या वेद-काल का मृग-चर्म
या बिन चोली लिपटी साड़ी ?

मूरत का धातु बदलने से
क्या कृष्ण बदल कर कंस हुआ?
सदियों तक इस पर बहस हुई
नहीं जिसका कोई भोर हुआ

अक़बर , कबिरा, गाँधी, शकुनि,
मंथरा, मीरा, लक्ष्मीबाई
एक मनुष्य में मिल जाते
जगते- सोते किरदार कई


फिर युगों से जीती कथाओं को
कब एक कथानक प्राप्त हुआ?
सदियों तक इस पर बहस हुई
नहीं जिसका कोई भोर हुआ

Wednesday, January 28, 2009

मंशा

मंशा - कभी कभी सोचती थी कि क्या उसकी किस्मत उसके नाम से है? या फिर उसका नाम उसके माता पिता ने उसकी आने वाली ज़िन्दगी को भाँप कर रखा था? मंशा - जैसे अधूरी सी एक इच्छा , जैसे कोई अंत-हीन कहानी।

" मिस! मिस! छाया ने विदुषी का दाँत तोड़ दिया!"
घबरा कर मंशा कॉरिडोर में पहुँची। विदुषी नाम की लड़की गला फाड़ फाड़ कर रो रही थी।
" ये क्या किया तुमने, छाया?", मंशा ने छाया से सख्ती से पुछा।
अपने हाथ में रुमाल से पकड़े हुए एक टूटे हुए दाँत को हवा में लहराते हुए छाया बोली, " मेरी कोई गलती नही है मिस। मैं तो बस उसे दिखा रही थी की दूध के दाँत को कैसे तोड़ते हैं।"
छाया की इन्ही हरकतों से मंशा झल्ला चुकी थी, " अभी चलो मेरे साथ प्रिंसिपल के ऑफिस में! इस उजड्ड लड़की पे तो उसका भी असर नही होता। नजाने कैसे घर वाले हैं। नोट पे नोट लिख कर भेजो, बेशर्मी से साइन करके वापस भी भेज देते हैं। अपने मम्मी पापा को बुला के लाना कल!"
विदुषी का रुदन सुन कर अब कॉरिडोर की सभी क्लासों के बच्चे बाहर आ गए थे। अक्सर क्लास में बैठे बोर होते हुए बच्चे इसी उम्मीद में रहते की कब छाया कुछ फसाद मचाये और हम तमाशा देखने बाहर जाएँ।
मंशा ने हर बार की तरह छाया की डायरी में उसकी शरारतों के बारे में नोट लिखा। लेकिन इस बार उसके माता पिता से स्कूल आ कर उससे मिलने का आग्रह भी किया। फिर चीखती हुई विदुषी को दवाइयों वाले कमरे में ले गई। इस तरह एक और दिन का अंत हुआ ।

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" साम , दाम, दंड , भेद! आपकी बच्ची पर तो किसी का असर नही होता ! कल ही एक बच्ची का दाँत तोड़ दिया! वो भी पक्का दाँत! उसके माँ-बाप ने कैसा बवाल मचा दिया कोई अंदाजा भी है आपको? अब मैं क्या जवाब दूँ? मेरी तो नौकरी पर ही बन आई है। सारा दिन क्या एक ही बच्ची को नज़रबंद करने का ज़िम्मा ले रखा है मैंने? आठ साल की बच्ची ने तीस-पैंतीस साल की टीचरों की हवाइयाँ उड़ा रखी हैं!", मंशा छाया की माँ, नियति , से पिछले बीस मिनटों से उसकी शिकायत कर रही थी।
और पिछले बीस मिनटों से नियति के मन में बस एक ही बात चल रही थी- "हे भगवान्। जल्दबाजी में मैं गीज़र तो खुला ही छोड़ आई। ये अगर घर आ पहुँचे तो कोहराम मचा देंगे। कल ही सब्जी में नमक ज़्यादा पड़ गया था। ये सच ही कहते हैं। मैं इतनी गैर जिम्मेदार हूँ। तभी तो छाया..."
"... तभी तो छाया को अपनी गलतियों का एहसास होगा।" कुछ सुझाव देते हुए मंशा ने अपनी बात पूरी की ।
" जी मैडम। अब आगे से ध्यान रखूंगी। अभी मैं जल्दी में हूँ। घर पे कुछ काम अधूरा ही छोड़ के आई हूँ।" नियति ने गीज़र के बारे में सोचते हुए कहा।
"इसके पापा क्यूँ नहीं आए?" मंशा ने हड़बड़ी में जाती हुई नियति से पुछा।
"वो... वो उन्हें कुछ ज़रूरी काम था । " नियति ने बहाना बनाया। वो कैसे बताती कि उसने पावक को बताया ही नहीं ? कभी भी नहीं। कि आज तक सारे नोट्स पर साइन भी उसी ने किए थे। कितना गैर जिम्मेदार समझेंगे वो उसे । वैसे भी कल सब्जी में नमक ज़्यादा पड़ गया था।

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दस सालों में कितना कुछ बदल जाता है। जितनी बार ये दुनिया गोल घूम चुकी होती है उतनी बार परिस्थितियाँ बदलती हैं, उतनी बार सपने बदलते हैं, उतनी बार अपने बदलते हैं। खुशियाँ कभी कभी त्रासदी बन जाती हैं... और त्रासदी समय के साथ एक मज़ाक! बस रह जाती है तो एक उम्मीद। क्यूँकी उम्मीद की बुनियाद पे ही तो दुनिया गोल घूमती है।
दस साल पहले बाईस साल की एक लड़की दिल्ली से रतलाम आई थीदिल्ली से रतलाम दो तरह के लोग आते हैंएक वो जो अपनी सारी ज़िन्दगी बड़े शहरों की भाग दौड़ में बिता कर अब आराम से किसी छोटे शहर में, अपना बड़ा सा घर बसाना चाहते हैंआख़िर जुड़ी हुई सविंग्स से एक बड़ा प्लाट खरीदने की उनकी क्षमता भी तो सिर्फ़ छोटे शहरों में लेने की होती है । दूसरे वो जिनकी मजबूरियाँ उन्हें खींच लाती हैं । जैसे कि बीमार माँ, या फिर ट्रान्सफर
मंशा की न तो उम्र हुई थी न ही कोई मजबूरी थी। फिर बाईस साल की कमसिन उम्र में उसका रतलाम जैसे शहर में क्या काम?
उस दिन , सड़क के किनारे , बस स्टाप की बैंच पे बैठे बैठे नजाने कितने घंटे बीत गए होंगे। घर जाती तो फिर वही आईना दीखता जिसमे वो दोनों अपनी शक्लें साथ साथ देखते और कहते "हैं न हम बिल्कुल मेड फॉर ईच अदर?" ; फिर वही बालकनी दिखती जहाँ रात रात भर बैठ कर वो उससे फ़ोन पे बातें करती। अब वो घर दोबारा कैसे जाएगी? ये सब कुछ सोच ही रही थी की सामने एक गाय दिखी। दिल्ली की सडकों पर गाय दिखना भी एक अजूबा ही है। M.C.D की वैन्स को इन बेचारियों से कुछ खासा ही लगाव है। उस दिन मानो वो गाय भी भगवान् की ही भेजी हुई थी। दुर्बल सी गाय, जिसकी पसलियाँ बाहर दीख रहीं थीं, इतनी दुर्बल होते हुए भी अपने छोटे से बछडे को दूध पिला रही थी। क्या खाती होगी जिसका ये दूध बन पाता होगा ये तो अल्लाह ही जानता है। ख़ुद अन्दर से लगभग खाली है लेकिन जितना दूध उसका बछडा खींचता उतना दूध उसके थनों में भर आता। वाकई आश्चर्यजनक है।
"क्या वाकई इतना आश्चर्यजनक है?" उसने सोचा। "क्या ये सच नही कि कुदरत ने हम सबको एक ऐसी ही ताक़त दी है? कि हम अन्दर से खाली होने के बाद भी कुछ चीज़ें दूसरों को दे सकते हैं और ऐसा करने से वो चीज़ें हम में वापस भरने लगती हैं?"
उसी दिन उसने फ़ैसला किया कि वो रतलाम जाएगी। वहाँ बच्चों को पढ़ाएगी। उन्हें शायद उसकी दिल्ली में मिली अच्छी शिक्षा से लाभ हो। इस तरह उनकी मदद करके शायद वो अपनी मदद भी कर सके।

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आज छाया स्कूल नहीं आई। "चलो! एक दिन तो शान्ति से बीतेगा!" , मंशा ने चैन कि साँस ली। पूरा दिन गुनगुनाते हुए काम किया। यहाँ तक कि बच्चों को एक पीरियड फ्री भी दे दिया। उसी फ्री पीरियड में उसने सोचा कि कुछ अधूरे काम पूरे कर ले । कल का क्या भरोसा किस नए फसाद में उलझ जाए? बड़े समय से बच्चों के रिकॉर्ड बनाने का काम वो टाल रही थी, तो सोचा कि उसी को निबटा ले। एक रजिस्टर में पाँच खाने बनाये। एक में बच्चे का, दूसरे में माता का, तीसरे में पिता का नाम, चौथे में पता, और पाँचवे में फोन नम्बर।
" नम्बर ग्यारह... छाया मिश्रा... माँ... नियति मिश्रा... पिता ... पावक मि..."
पावक मिश्रा। पिता का नाम पावक मिश्रा। मंशा को मानो साँप सूँघ गया हो।
उसने झट से नम्बर देखा-9425311709

नम्बर के आखिरी चार अंक 1709 थे । पावक अपने नंबरों के आखिरी चार अंक 1709 ही रखता था। सत्रह सितम्बर- उसका जन्मदिन।

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"ये कैसा मज़ाक है भगवान् जी! सोचा था कि वो एक बुरा सपना था जो मेरी ज़िन्दगी में होना ज़रूरी थाशायद मेरे कर्मों का फललेकिन ये भी सोचा था कि आप मेरे साथ हैंऔर मुझे उस अंधेरे से बाहर निकालेंगे जिसमे आपने मुझे शायद कुछ सिखाने के लिए धकेलाऔर आपने निकाला भीतो अब ये कौनसी नई परीक्षा? क्या मैं कई परीक्षाएं दे नहीं चुकी? क्या ज़िन्दगी भर मैं बस परीक्षाएँ ही देती रहूँगी, अपने आप को सिद्ध ही करती रहूँगी? किस लिए? एक दिन मर जाने के लिए?"
भगवान् से इस तरह संवाद करना मंशा कि आदत बन चुकी थी। उस रात उसे नींद नहीं आई। लेकिन ज़िन्दगी के बुरे से बुरे वक्त में भी सोना, उठना, खाना, तैयार होना, सब्जी वाले से दाम पे बहस करना, उसने सीख लिया था। तो सुबह होते ही उसकी आँख लग गई। नींद खुली मोबाइल फ़ोन की घंटी से, जो कि सातवीं बार बज रहा था।
"हैलो?"
"मंशा, कहाँ रह गयीं तुम? कोई ख़बर नही। सुबह से फ़ोन लगाते लगाते आफत आ गई।", प्रिंसिपल की आवाज़ दूसरी तरफ़ से गरज रही थी। "छाया ने यहाँ बवाल मचा रखा है। दो बच्चियों के टिफिन छीन कर खिड़की से बाहर फेंक दिए। जल्दी आओ!"
" बाप पर जो गई है", मंशा ने मन ही मन सोचा
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" मेरी गलती नही है मिस। सब इसी की गलती है। इससे पूछो इसने मेरा कहना क्यूँ नही माना?", छाया ने अपनी सफाई दी।
"कौनसा कहना?", मंशा ने पूछा।
" जब मैंने कहा कि अपने टिफिन से एक रोटी चम् चम् को दे दे तो दी क्यूँ नही?"
"चम् चम्?", मंशा का सर घूम रहा था।
"मिस, चम् चम् वो गन्दे, काले कुत्ते का नाम है जो नीचे गार्ड अंकल के बूथ के पास बैठता है।" विदुषी ने पुराना बदला लेने की एक कोशिश करते हुए कहा।
" छाया, सारी दुनिया तुम्हारा कहना माने ये ज़रूरी नही हैसबकी अपनी अपनी सोच हैकिसी को चम् चम् पसंद है किसी को नहीअपनी सोच दूसरों पे थोपना बंद करो! और अपनी ग़लती मानना सीखो! समझीं?", मंशा ने छाया को डाँटते हुए कहा।

और कड़वाहट भरे मन से सोचा, "तुम्हारा बाप तो कभी नही समझा"
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स्कूल जाना अब मंशा के लिए एक सज़ा सी हो गई थी। वैसे तो छाया कभी भी उसे फूटी आँख नही सुहाती थी, लेकिन जबसे पावक वाली बात का पता चला, तबसे तो मानो उसे उसकी हर हरकत में पावक नज़र आता हो। पहले तो वो उसे झल्लाहट में डांटती, लेकिन अब उसकी डांट में एक अजीब सी कटुता थी, उसके शब्दों में घृणा का डंक । कई बार वो अपने को समझाती कि छाया एक आठ साल की बच्ची है, दुष्ट ही सही, और वो बत्तीस साल की औरत। उसे अपने पर इससे ज़्यादा काबू होना चाहिए। ये सोच कर जिस दिन वो स्कूल जाती भी, छाया की हरकतों को देख अपना आपा खो बैठती। मानो २२ साल की वो लड़की बाहर आ जाती हो। २२ साल की वो लड़की भी तो बच्ची ही थी...
एक दिन छाया क्लास लेट पहुँची। जब मंशा ने लेट आने का कारण उससे पूछा तो उसने मुँह चिढ़ा कर अपनी गर्दन फेर ली। छाया के लिए ऐसा करना आम बात थी लेकिन मंशा के सब्र का घड़ा भर चुका था, और उस दिन उसने अपने अध्यापन कार्यकाल में पहली बार किसी बच्ची पर हाथ उठाया। गुस्से से तिलमिलाती मंशा तेज़ी से क्लास से बाहर स्टाफ रूम को बढ़ी। क्लास रूम से स्टाफ रूम के छोटे से सफर में उसके हाथों की कम्पन और गालों के फड़कने की वजह गुस्से से बदल कर पश्चात्ताप हो रही थी। स्टाफ रूम में घुसते ही दरवाज़ा बंद कियासौभाग्य से वहाँ कोई नही था दस सालों बाद वो फूट फूट के रो रही थी।
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" मैं पापा को बताऊंगीSSS! तुमने मुझे माराSSS! वो तुमको खूब मारेंगेSSS!", छाया अपने आप को टॉयलेट में बंद कर के ज़ोर ज़ोर से दहाड़ रही थी।
"छाया ... बेटा ... दरवाजा खोलो... तुम अच्छी बच्ची हो ना ?" मंशा ने उसे बहलाने की कोशिश की।
" मैं अच्छी बच्ची नही हूँ SSS! मैं अच्छी बच्ची नही हूँ SSS!"
" अरे नहीं बेटा। किसने कहा तुम अच्छी बच्ची नहीं हो?"
तपाक से जवाब आया, "सबने SSS... तुमने , प्रिंसिपल मैम ने, पापा ने SSS"
मंशा के दिल की एक धड़कन उस समय सुई जैसी उसे चुभी। वो ये कैसे भूल गई की पल पल अगर किसी को उसकी कमियों का एहसास दिलाया जाए, उसे ये बताया जाए की वो कितना बुरा है, कितना लापरवाह, कितना गैर जिम्मेदार, तो वो इन पे यकीन करने लगता है ?"
" छाया बेटी। आय एम् सॉरी! तुम तो इस क्लास की सबसे प्यारी लड़की हो!", मंशा सच बोल रही थी।
अचानक टॉयलेट के उस पार खामोशी छा गई। एक धीमी सी आवाज़ आई, "सच्ची? तुम मुझे बाहर निकलने के लिए झूट तो नही बोल रही?"
" नही बेटा! एकदम सच्ची!"
चिटकनी खुली। मंशा ने छाया को गले लगा लिया।

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"प्रिय मैडम,
आज छाया के गाल पे हमने उँगलियों के निशान देखे। पूछने पे पता चला की आपने उसे थप्पड़ मारा। पिछली बार जब उसके पुराने स्कूल में मास्टरनी ने ऐसा किया था तो हमने उन्हें अपनी पहुँच के दम पे स्कूल से निकलवा दिया था। हमें अपनी गलती का एहसास कभी न होता अगर आज उसने हमेशा की तरह ये न कहा होता कि गलती उसकी नही थी। आज उसने न केवल ये स्वीकारा की गलती उसी की थी बल्कि एक सवाल पूछ के हमें शर्मसार कर दिया। उसने हमसे पूछा, "पापा, थप्पड़ तो टीचर ने मारा, पर फिर सॉरी उन्होंने क्यूँ कहा ?" शायद छाया ने हमेशा अपने घर पे गुस्सा और दमन करने वाले को ही सही सिद्ध होते हुए देखा था।
हम में इतनी शक्ति तो नही कि आपसे मिल कर ये बात कह पाते इसलिए पत्र के माध्यम से आपसे माफ़ी मांग रहे हैं और आपका शुक्रिया कर रहे हैं। वैसे हम कभी भी किसी से इतनी बातें नही कहते लेकिन नजाने क्यूँ आपके बारे में सुन कर ऐसा लगा जैसे आप ये समझ जाएँगी।
हम कोशिश करेंगे कि भविष्य में आपको शिकायत के कोई अवसर प्राप्त न हों।

आपका शुक्रगुजार,
पावक मिश्रा"

पत्र को सलीके से तह कर मंशा ने उसे अलमारी के लॉकर में रख दिया जहाँ वो अपनी यादों से जुड़ी हर चीज़ रखती थी। उन चीज़ों में पावक कि ये पहली और अकेली चीज़ थी। पुरानी चिट्ठियाँ और तोहफे तो उसने कब के फेंक दिए थे। दस साल पहले ही। इसलिए क्यूँकि वो उन सब चीज़ों से बाहर आना चाहती थी। और उसे लगा भी था कि वो उन सब से बार आ गई थी। लेकिन शायद नही। क्यूँकि किसी चीज़ से पूरी तरह से बाहर शायद तभी आया जा सकता है जब मन में अतीत के सामने आने का डर न हो, अतीत के सायों और किरदारों के प्रति मन में घृणा न हो, बुरी यादों की कड़वाहट न हो और अच्छी यादें मन में न पैदा करें - मंशा ...

आज ये पत्र वो इसलिए संभाल सकी क्यूँकि उसके मन में उसे ले कर न कोई भय था, न कोई मंशा। थी तो बस एक भीनी सी मिठास, जो लम्बी बीमारी के बाद स्वस्थ होने पर होती है। ये पत्र उसे ये याद दिलाता रहेगा कि किसी के मन में अगर रावण है, तो राम भी। कि कड़वाहट कड़वाहट को नही मारती। कि कहानी का अंत सुखद हो या दुखद- ये हमारे हाथों में है। और ये कि भगवान् जो भी करता है, अच्छे के लिए करता है...